🇮🇳 बगराम में भारत की उपस्थिति: अफगानिस्तान की नई कूटनीतिक बिसात पर अमेरिका की चिंता और पाकिस्तान की घबराहट




मध्य भारत मीडिया | विशेष रिपोर्ट
रिपोर्टर: नरेंद्र धनोतिया
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🛰️ बगराम का भू-राजनीतिक महत्व
अफगानिस्तान का बगराम एयरबेस — कभी अमेरिका और नाटो सेनाओं का सबसे बड़ा ठिकाना — अब एशिया की नई शक्ति-संतुलन रेखा बन चुका है।
अमेरिकी वापसी के बाद यह बेस निष्क्रिय पड़ा था, लेकिन अब भारत की बढ़ती सक्रियता ने अमेरिका को उत्साहित, अफगानिस्तान को सावधान और पाकिस्तान को बेचैन कर दिया है।
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🇦🇫 अफगानिस्तान की स्थिति: संप्रभुता और स्थिरता की खोज
तालिबान सरकार के लिए बगराम राष्ट्रीय संप्रभुता और वैधता का प्रतीक है।
वह अंतरराष्ट्रीय पहचान चाहता है, लेकिन अपनी सीमाओं में रहकर।
भारत के साथ उसके रिश्ते धीरे-धीरे सहयोगात्मक हो रहे हैं — शिक्षा, स्वास्थ्य और पुनर्निर्माण परियोजनाओं में भारत की भूमिका तालिबान शासन के लिए भी उपयोगी साबित हो रही है।
> तालिबान समझ चुका है कि भारत के साथ संवाद उसके लिए राजनीतिक मान्यता और आर्थिक सहयोग दोनों का रास्ता खोल सकता है।
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🇮🇳 भारत की नीति: विकास के सहारे सुरक्षा
भारत की कूटनीति हमेशा से अफगानिस्तान में “विकास आधारित प्रभाव” की रही है।
सलमा बाँध, अफगान संसद भवन और ज़रांज–डेलाराम हाइवे जैसे प्रोजेक्ट्स भारत की स्थायी उपस्थिति का प्रतीक हैं।
अब जब अफगानिस्तान पर तालिबान का शासन है, भारत सैन्य तैनाती के बजाय तकनीकी, मानवीय और सुरक्षा सहयोग की रणनीति पर काम कर रहा है।
सूत्रों के अनुसार भारत की कुछ टीमें बगराम क्षेत्र में पुनर्निर्माण और खुफिया सहयोग में परोक्ष रूप से सक्रिय हैं।
> भारत का मकसद है कि अफगान धरती फिर से आतंकवाद का अड्डा न बने, खासकर वे समूह जो भारत के खिलाफ काम करते हैं।
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🇺🇸 अमेरिका की चिंता: चीन और ईरान की ओर झुकाव
अमेरिका 2021 में अफगानिस्तान से जल्दबाजी में बाहर आया, लेकिन अब वह उसी इलाके में अपना प्रभाव वापस पाना चाहता है।
बगराम इसके लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है —
यह चीन के शिनजियांग, ईरान के परमाणु केंद्रों और रूस के प्रभाव क्षेत्र के बीच स्थित है।
अमेरिका के लिए भारत इस मिशन का स्वाभाविक साझेदार है।
भारत यदि बगराम के ज़रिए क्षेत्र में उपस्थिति बढ़ाता है, तो अमेरिका को भी बिना सीधा हस्तक्षेप किए अपनी पहुँच मिल सकती है।
> वॉशिंगटन की नज़र में “भारत की उपस्थिति” क्षेत्र में लोकतांत्रिक और स्थिर प्रभाव बनाए रखने का सबसे सुरक्षित रास्ता है।
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🇵🇰 पाकिस्तान की घबराहट: रणनीतिक गहराई का अंत
पाकिस्तान के लिए यह सबसे असहज स्थिति है।
वर्षों तक उसने अफगानिस्तान को अपनी “स्ट्रैटेजिक डेप्थ” कहा — यानी भारत के खिलाफ पश्चिमी सुरक्षा दीवार।
लेकिन अब भारत और तालिबान के बीच बढ़ता संवाद इस सोच को तोड़ रहा है।
इसलिए पाकिस्तानी मीडिया और राजनैतिक वर्ग में “बगराम में भारतीय उपस्थिति” को लेकर गहरी बेचैनी है।
विश्लेषकों का मानना है कि इससे पाकिस्तान पर दो मोर्चों — पूर्व (भारत) और पश्चिम (अफगानिस्तान) — से दबाव बढ़ सकता है।
> पाकिस्तान अब अफगानिस्तान को अपना पिछवाड़ा नहीं, बल्कि भारत का संभावित साझेदार बनने से रोकने में असमर्थ दिख रहा है।
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🕊️ भारत की कूटनीति: संवाद, न टकराव
भारत फिलहाल शांत लेकिन असरदार कूटनीति अपना रहा है।
नई दिल्ली ने तीन दिशाओं में काम शुरू किया है —
1. अफगानिस्तान के साथ मानवीय और विकास सहयोग
2. अमेरिका के साथ खुफिया और आतंक-रोधी साझेदारी
3. पाकिस्तान और चीन से दूरी, लेकिन संवाद की खिड़की खुली
यह नीति भारत को अफगानिस्तान में प्रभावशाली बनाए रखती है, बिना किसी सीधी सैन्य भागीदारी के।
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🌍 निष्कर्ष: दक्षिण एशिया की नई बिसात
अफगानिस्तान चाहता है स्थिरता और वैश्विक पहचान।
भारत चाहता है सुरक्षा और संतुलन।
अमेरिका चाहता है पुनः प्रभाव।
पाकिस्तान डरता है अपने पुराने नियंत्रण के खत्म होने से।
इन चारों के बीच बगराम अब सिर्फ एक बेस नहीं, बल्कि कूटनीतिक शक्ति संतुलन का नया प्रतीक बन चुका है।
> “बगराम की ज़मीन अब बंदूक़ों की नहीं, संवाद की शक्ति से गूंज रही है —
और भारत इस संवाद का केंद्र बनता जा रहा है।”📍 रिपोर्ट: नरेंद्र धनोतिया
मध्य भारत मीडिया — अंतरराष्ट्रीय डेस्क
📅 विशेष अंक | अक्टूबर 2025


